Maharana Pratap Life History

maharana pratap life history

Maharana Pratap

Maharana Pratap Life History

स्वत्रंत्रता प्रेमी मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप का जन्म ज्येष्ठा सुदी त्रयोदशी, 31 मई 1539 को सिसोदिया वंश में हुआ था | महाराणा प्रताप के माता पिता मेवाड़ के महाराणा उदय सिंह जी तथा जयंता देवी थे | 28 फरवरी 1572 को महाराणा प्रताप का राज तिलक हुआ था |

“अवर नृप पतशाह अगै, ह़ोय भृत जोडे हाथ,
नाथ उदेपुर न नम्यो , नम्यो न अर्बुद नाथ।”

महाराणा प्रताप के राज तिलक के दौरान, सभी राजा उनकी सेवा में हाथ जोड़ कर खड़े थे | लेकिन केवल दो राजा, उदयपुर के राणा प्रताप और अबुर्द प्रदेश सिरोही के महाराव सुरतान सिंह ने हाथ नहीं जोड़े |

राजा महाराणा प्रताप सिंह और महाराव सुरतान दोनों ऐसे शासक थे जिन्होंने अपने प्रदेश कि रक्षा के लिए सारे राज शाही ठाट बाट छोड़ दिए थे | और वे दोनों पहाड़ी क्षेत्र और गुफाओं में अपना जीवन व्यतीत करते थे |

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महाराव सुरतान सिंह ने सिरोही क्षेत्र पर 5 साल तक राज किया | लेकिन 5 साल बाद अकबर ने सिरोही पर हमला करने कि लिए सेना भेजी | महाराव युद्ध हार गए | लेकिन उन्होंने गुलामी स्वीकार नहीं की | वे माउंट आबू चले गए | वहा से मौका पाकर उन्होंने मुग़ल सेना पर कई बार हमला किया | कई बार सिरोही क्षेत्र उनके कब्जे में आया लेकिन पुनः मुग़ल हमला करके उसे अपने कब्जे में ले लेते थे | आखिरकार उन्होंने अपनी सेना को इकट्टा करके पुनः मुग़ल सेना पर हमला किया | और उन्होंने मुग़ल सेना के अधिकारी सईद हाकिम को मार दिया और उन्होंने सिरोही पर पुनः कब्ज़ा कर लिया |

haldighati war

Haldighati War

हल्दी घाटी युद्ध महाराणा प्रताप और मुग़ल सेना के बीच लड़ा गया था | 18 अक्टूबर 1583 को राव सुरतान सिंह माउंट आबू से निचे आये, और एक प्रसिद्ध जगह दत्तनयी पर उन्होंने मुग़ल सेना पर हमला कर दिया | इस तरह राव सुरतान सिंह ने मुग़लो से लड़ने में महाराणा प्रताप की मदद की |

असल में, महाराव सुरतान सिंह पिंडवाड़ा, वसन्तगढ, आबू की पहाड़ियों में अपनी सेना को बढ़ाने के लिए भील और गरासिया जन जाती की मदद ले रहे थे | महाराव पिंडवाड़ा की पहाड़ियों में गोगुन्दा घाटी में मुग़लो पर लगातार गोरिल्ला पद्द्ति से हमला कर रहे थे | क्योकि मुग़ल गोगुन्दा घाटी के रास्तें मेवाड़ पर हमला करने जा रहे थे |

महाराणा प्रताप का सामना मुग़ल शाशक अकबर से हल्दी घाटी में हुआ | तब महाराव सुरतान सिंह देवड़ा ने अकबर की सेना को दतरनी युद्ध के मैदान से भगा दिया |

महाराणा प्रताप मुग़लों के साथ आजीवन युद्ध करते रहे लेकिन उनकी गुलामी स्वीकार नहीं की | इसी तरह अपनी 51 साल के जीवन में महाराव सुरतान सिंह ने 52 युद्ध लाडे |

“इक्यावन बरस जीवियो बनाढ , जीतो निज बावन महाराड़ “

Mahipal Singh

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